रुड़की/देहरादून। हिमालय की ऊंची और चुनौतीपूर्ण चोटियों पर लगातार सफलता हासिल करते हुए रुड़की निवासी एवं भारतीय सेना के सूबेदार अंकुर रावत ने एक और बड़ी उपलब्धि अपने नाम कर ली है। दो बार माउंट एवरेस्ट का सफल आरोहण कर चुके अंकुर रावत ने 22 सितंबर 2026 को 6,512 मीटर ऊंची माउंट भागीरथी-II के शिखर पर तिरंगा फहराया। इससे पहले 17 जुलाई 2026 को उन्होंने 7,077 मीटर ऊंचे माउंट कुन का सफल आरोहण किया था। इस तरह करीब दो माह के भीतर दो ऊंची हिमालयी चोटियों पर सफल चढ़ाई कर उन्होंने पर्वतारोहण के क्षेत्र में अपनी क्षमता और अनुभव का एक बार फिर परिचय दिया है।

एवरेस्ट के बाद लगातार बड़ी उपलब्धियां
अंकुर रावत का पर्वतारोहण का सफर लंबे अनुभव और चुनौतियों से भरा रहा है। वर्ष 2016 में उनके एवरेस्ट फतह की उपलब्धि भी अखबारी रिपोर्टों में दर्ज है। उस समय उन्होंने बताया था कि सेना की ओर से पर्वतारोहण दल में चयन के बाद उन्होंने कठिन प्रशिक्षण और अभियान के जरिए दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक पहुंचने में सफलता हासिल की थी।
इसके बाद भी उनका पर्वतारोहण अभियान जारी रहा। जुलाई 2026 में उन्होंने लद्दाख की जांस्कर पर्वत श्रृंखला में स्थित माउंट कुन पर तिरंगा फहराया। भारतीय सेना के प्री-एवरेस्ट मैसिफ अभियान के तहत 27 सदस्यीय पर्वतारोही दल के साथ उन्होंने 17 जुलाई को यह सफलता हासिल की थी। इससे पहले वर्ष 2023 में वह माउंट कुन की सहयोगी चोटी माउंट नून (7,135 मीटर) का भी सफल आरोहण कर चुके हैं।
भागीरथी-II की चढ़ाई रही चुनौतीपूर्ण
भागीरथी-II अभियान के दौरान अंकुर रावत और उनकी टीम को कठिन चट्टानी रास्तों, बर्फीले हिस्सों, बदलते मौसम और अत्यधिक ऊंचाई जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। अभियान के अंतिम हिस्से में चट्टानी चढ़ाई के बाद करीब 300 मीटर का बर्फीला क्षेत्र बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया।
शिखर नजदीक दिखाई देने के बावजूद इस हिस्से में पर्वतारोहियों को बेहद सावधानी और धैर्य के साथ आगे बढ़ना पड़ा। अंकुर रावत के अनुसार, पर्वतारोहण में शिखर दिखाई देना इस बात की गारंटी नहीं है कि मुश्किलें खत्म हो गईं। कई बार अंतिम कुछ मीटर ही सबसे चुनौतीपूर्ण होते हैं और ऐसे समय में अनुभव तथा सही निर्णय बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
शिखर से दिखा हिमालय का अद्भुत नजारा
भागीरथी-II के शिखर पर पहुंचने के बाद अंकुर रावत को हिमालय की कई प्रमुख चोटियों के दर्शन हुए। इनमें माउंट शिवलिंग, नंदी पर्वत, थलय सागर, मेरु, केदारनाथ पर्वत, केदार डोम, चौखंबा, सतोपंथ, वासुकी, माना, कामेट, मुकुट और सुदर्शन जैसी चोटियां शामिल हैं।
सही रूट, अनुशासन और टीमवर्क को बताया सफलता की कुंजी
अंकुर रावत पर्वतारोहण की सफलता को केवल व्यक्तिगत साहस से नहीं जोड़ते। उनका कहना है कि किसी भी उच्च हिमालयी अभियान में सही रूट का चयन, रूट ओपनिंग, रोप फिक्सिंग, टीम अनुशासन और आपसी विश्वास बेहद महत्वपूर्ण होता है।
उनके मुताबिक सुरक्षित मार्ग तैयार होने के बाद पूरी टीम को अनुशासन और आपसी विश्वास के साथ आगे बढ़ना होता है। कठिन परिस्थितियों में टीम का तालमेल ही अभियान को सुरक्षित और सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
रुड़की से हिमालय की चोटियों तक पहुंचा अंकुर का सफर
अंकुर रावत रुड़की के विनीत नगर, पनियाल रोड क्षेत्र के निवासी हैं। उनके पिता नारायण सिंह रावत और माता आनंदी देवी हैं, जबकि उनका मूल गांव पौड़ी गढ़वाल के पट्टी असवालस्यूं क्षेत्र का पीपला गांव बताया गया है। रुड़की के इस युवा पर्वतारोही की उपलब्धियों ने स्थानीय स्तर पर भी गौरव बढ़ाया है।
अब अनछुई चोटियों पर तिरंगा फहराने का लक्ष्य
भागीरथी-II की सफलता के बाद अंकुर रावत की नजर अब उन ऊंची चोटियों पर है, जहां अभी तक वह नहीं पहुंच सके हैं। इसके साथ ही वह अपने अनुभवों को नए ट्रेकर्स और पर्वतारोहियों तक पहुंचाना चाहते हैं, ताकि युवा पर्वतारोहण को केवल रोमांच नहीं बल्कि जिम्मेदारी और अनुशासन के साथ समझें।
उन्होंने उत्तराखंड आने वाले ट्रेकर्स और पर्वतारोहियों से अपील की है कि किसी भी उच्च हिमालयी अभियान पर निकलने से पहले रूट की स्थिति, मौसम, भू-भाग, ऊंचाई से जुड़ी चुनौतियों और स्थानीय परिस्थितियों की पूरी जानकारी हासिल करें। पर्वत की परिस्थितियों का सम्मान करना और जोखिम बढ़ने पर सही समय पर निर्णय लेना सुरक्षित पर्वतारोहण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
‘शिखर तक पहुंचना ही पूरी सफलता नहीं’
अंकुर रावत का संदेश स्पष्ट है कि पर्वतारोहण में सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि पर्वतारोही कितनी ऊंचाई तक पहुंचा। सटीक तैयारी, साहस, अनुशासन, अनुभव और सही समय पर सही निर्णय ही किसी अभियान को सफल बनाते हैं।
माउंट कुन की 7,077 मीटर ऊंचाई से लेकर भागीरथी-II की 6,512 मीटर ऊंचाई तक अंकुर रावत की यह लगातार सफलता बताती है कि हिमालय में असली मुकाबला केवल पहाड़ की ऊंचाई से नहीं, बल्कि पर्वतारोही की तैयारी, धैर्य और निर्णय क्षमता से होता है।


