“डिजिटल अरेस्ट” शब्द लगातार सुनाई दे रहा है। छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक, गांवों से लेकर विकसित नगरों तक यह साइबर गैंग तेजी से सक्रिय है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इनके शिकार अक्सर वही लोग बन रहे हैं जिन्हें समाज पढ़ा-लिखा, समझदार और जागरूक मानता है। इनमें रिटायर्ड अधिकारी, बैंक कर्मचारी, शिक्षक, सेना के अधिकारी, पुलिसकर्मी और उच्च शिक्षित लोग शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बढ़ते खतरे पर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि यह बेहद गंभीर और हैरत वाली स्थिति है कि शिक्षित लोग भी इस तरह की ठगी का शिकार हो रहे हैं। कोर्ट ने साइबर अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए सख्त व्यवस्था की जरूरत बताई है।
क्या है डिजिटल अरेस्ट?
डिजिटल अरेस्ट में अपराधी खुद को पुलिस अधिकारी, सीबीआई अफसर, ईडी अधिकारी, कोर्ट कर्मचारी या सरकारी एजेंसी का प्रतिनिधि बताकर वीडियो कॉल या ऑडियो कॉल करते हैं। वे कहते हैं कि आपका आधार कार्ड अपराध में इस्तेमाल हुआ है, आपके बैंक खाते में मनी लॉन्ड्रिंग हुई है, या आपके खिलाफ वारंट जारी है।
इसके बाद वे पीड़ित को डराते हैं, घंटों वीडियो कॉल पर रोके रखते हैं, किसी से बात न करने की धमकी देते हैं और खाते की जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर करा लेते हैं। व्यक्ति मानसिक दबाव में आकर लाखों रुपये गंवा बैठता है।
क्यों फंस रहे हैं पढ़े-लिखे लोग?
सरकारी सिस्टम का डर – पढ़े-लिखे लोग कानून का सम्मान करते हैं, इसलिए नोटिस या गिरफ्तारी के नाम से घबरा जाते हैं।
तुरंत निर्णय का दबाव – ठग पीड़ित को सोचने का समय नहीं देते।
तकनीकी भ्रम – वीडियो कॉल, फर्जी आईडी कार्ड, सरकारी लोगो देखकर लोग भरोसा कर लेते हैं।
प्रतिष्ठा बचाने की चिंता – कई लोग बदनामी के डर से चुपचाप पैसे दे देते हैं।
उत्तराखंड और देहरादून में भी कई मामले
देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश और हल्द्वानी जैसे शहरों से इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं। कहीं रिटायर्ड अफसर से लाखों रुपये ठग लिए गए, कहीं महिला शिक्षक को पुलिस कार्रवाई का डर दिखाकर रकम ट्रांसफर करवाई गई। कई मामलों में बैंक कर्मचारियों की सतर्कता से अंतिम समय में पैसे रुक गए।
क्या करें?
कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर पैसे नहीं मांगती।
पुलिस या कोर्ट फोन पर गिरफ्तारी नहीं करती।
डराने वाली कॉल आए तो तुरंत फोन काटें।
1930 साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत करें।
नजदीकी थाने और साइबर सेल को तुरंत सूचना दें।
परिवार के किसी सदस्य से तुरंत बात करें।
OTP, बैंक डिटेल, स्क्रीन शेयर कभी न करें।
डिजिटल अरेस्ट सिर्फ साइबर अपराध नहीं, मानसिक हमला है। ठग पहले दिमाग को कैद करते हैं, फिर बैंक खाते को खाली करते हैं। जागरूकता ही इसका सबसे बड़ा इलाज है। याद रखिए—अगर कोई आपको फोन पर डराकर पैसे मांग रहा है, तो वह अधिकारी नहीं, ठग है।
जीवन भर की कमाई बचानी है तो डरिए मत, तुरंत रिपोर्ट कीजिए।


