कांग्रेस पार्टी एक बार फिर अपने ही नेताओं के कारण सुर्खियों में है—और इस बार मामला सिर्फ असहमति का नहीं, बल्कि सीधे-सीधे विश्वासघात का नजर आ रहा है।

राज्यसभा चुनावों में बिहार, ओडिशा और हरियाणा से जो तस्वीर सामने आई, उसने यह सवाल और गहरा कर दिया है कि आखिर कांग्रेस अपने ही घर को कब संभालेगी?
बिहार में कांग्रेस के 6 में से 3 विधायक वोटिंग के दिन ऐसे “गायब” हुए, मानो लोकतंत्र की क्लास बंक कर दी हो। नतीजा यह हुआ कि विपक्ष के हाथ आने वाली सीट एनडीए की झोली में चली गई। ऊपर से पार्टी प्रभारी का भी नदारद रहना—जले पर नमक छिड़कने जैसा रहा।
ओडिशा में तो कहानी और दिलचस्प रही। पार्टी के अंदर असहमति इतनी खुली कि विधायक ने पहले ही विरोध जता दिया, लेकिन नेतृत्व ने मानो आंखें मूंद लीं। परिणाम—तीन विधायकों ने पार्टी लाइन छोड़कर विरोधी खेमे में वोट डाल दिया। बाद में निलंबन की कार्रवाई जरूर हुई, लेकिन तब तक “खेल” खत्म हो चुका था।
हरियाणा में कांग्रेस जीत तो गई, लेकिन यह जीत किसी जश्न से ज्यादा एक चेतावनी जैसी लगी। 37 विधायकों के बावजूद 28 वोट ही मिल पाए, 5 वोट अवैध हो गए और खबरें हैं कि 4 विधायकों ने “दिल” कहीं और लगा लिया। अब पार्टी उन “गुमनाम नायकों” की तलाश में जुटी है, जिन्होंने भीतर से ही खेल बिगाड़ दिया।
कांग्रेस के लिए यह कोई नई कहानी नहीं है—यह वही पुराना सवाल है:
“दुश्मन बाहर है या भीतर?”जब अपने ही “रणनीतिक” फैसले लेने लगें,तो विपक्ष की जरूरत ही क्या रह जाती है?
कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती आज विपक्ष नहीं,बल्कि अपने ही लोग बनते जा रहे हैं।जब तक पार्टी अपने घर के दरवाजे मजबूत नहीं करेगी,तब तक बाहर की लड़ाई जीतना सिर्फ एक कल्पना ही रहेगा।


