रुड़की। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ही रुड़की की सियासत में हलचल तेज हो गई है। सत्ता और संगठन के बीच खींचतान, दावेदारों की बढ़ती फेहरिस्त और नेताओं की गुपचुप बैठकों ने चुनावी तापमान को अभी से बढ़ा दिया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खेमों में अंदरखाने की रणनीतियां नए समीकरण गढ़ रही हैं।

भाजपा: घर के भीतर चुनौती
एक ओर मौजूदा विधायक प्रदीप बत्रा 2027 की तैयारी में जुटे हैं, तो दूसरी ओर पार्टी के ही युवा चेहरे चैरब जैन खुलकर चुनौती देते नजर आ रहे हैं। संगठन के भीतर युवा बनाम अनुभव की यह जंग आने वाले महीनों में और तेज हो सकती है। सवाल यह है कि क्या पार्टी ‘रिपीट’ का फार्मूला अपनाएगी या बदलाव का दांव खेलेगी?
कांग्रेस: दावेदारों की लंबी कतार
कांग्रेस में तस्वीर और भी पेचीदा है। मेयर चुनाव के बाद जहां सचिन गुप्ता के टिकट को लेकर चर्चाएं तेज थीं, वहीं अब समीकरण बदलते दिख रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल की छत्रछाया में सचिन गुप्ता सक्रिय हैं, लेकिन मैदान में नए-पुराने दावेदारों की एंट्री से स्थिति त्रिकोणीय होती जा रही है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह इन दिनों यशपाल राणा के साथ नजर आ रहे हैं। राणा, जो मेयर चुनाव निर्दलीय लड़ चुके हैं और हार का सामना कर चुके हैं, अब फिर से मुख्यधारा में वापसी की कोशिश में बताए जा रहे हैं। उनके निष्कासन पर भी सियासी गलियारों में सवाल उठ रहे हैं। क्या पार्टी उन्हें दोबारा अपनाएगी या वे निर्दलीय ही मैदान सजाएंगे?
गौरव गोयल की संभावित एंट्री से बढ़ी हलचल
सूत्रों के मुताबिक, गौरव गोयल होली के बाद कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं। गोयल स्वयं भी संकेत दे चुके हैं कि वे सक्रिय राजनीति में बड़ा कदम उठाने वाले हैं। अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस के भीतर दावेदारों की संख्या और बढ़ेगी और टिकट की दौड़ और रोचक हो जाएगी।
इधर युवा चेहरा प्रणय प्रताप सिंह भी समर्थकों के बीच सक्रिय बताए जा रहे हैं। यदि वे भी दावेदारी ठोकते हैं तो समीकरण और उलझ सकते हैं।
मेयर चुनाव की छाया
मेयर चुनाव में भाजपा की अनीता अग्रवाल ने जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी पूजा गुप्ता तीसरे स्थान पर रहीं। उस चुनाव के परिणाम ने कांग्रेस की रणनीति पर सवाल खड़े किए थे। अब 2027 से पहले पार्टी संगठनात्मक मजबूती और चेहरे की स्वीकार्यता दोनों पर संतुलन साधने की कोशिश में है।
बड़ा सवाल: पार्टी किस पर लगाएगी दांव?
रुड़की की सियासत में फिलहाल तीन बड़े प्रश्न तैर रहे हैं—
क्या भाजपा अनुभव पर भरोसा करेगी या युवा कार्ड खेलेगी?
क्या कांग्रेस सचिन गुप्ता को दोबारा मौका देगी?
क्या गौरव गोयल या यशपाल राणा में से कोई बाजी मार जाएगा?
या फिर युवा शक्ति समीकरण पलट देगी?
जनता किसे चुनेगी, यह बाद की बात है। उससे पहले दलों को यह तय करना है कि उनकी ‘नैया का खेवैया’ कौन होगा। फिलहाल सियासी बिसात बिछ चुकी है, मोहरे सज चुके हैं—अब सबकी नजर टिकट की पहली चाल पर टिकी है।


