देहरादून। उत्तराखंड में नकली दवाओं का कारोबार लगातार चिंता का विषय बनता जा रहा है। राजधानी देहरादून समेत राज्य के कई जिलों में समय-समय पर नकली दवा बनाने वाली फैक्ट्रियों का खुलासा होने के बावजूद यह अवैध नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है। हाल ही में देहरादून के ईस्ट होप टाउन क्षेत्र में नकली दवा फैक्ट्री पकड़ी गई, जबकि इससे पहले सेलाकुई, हरिद्वार, रुड़की, कोटद्वार और रुद्रपुर में भी ऐसी फैक्ट्रियों का भंडाफोड़ हो चुका है। जांच में सामने आया है कि प्रतिष्ठित दवा कंपनियों के नाम और पैकेजिंग का इस्तेमाल कर नकली दवाओं को असली बताकर बाजार में उतारा जा रहा था।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल फैक्ट्री पकड़ लेना पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती उस संगठित नेटवर्क तक पहुंचने की है, जो नकली दवाओं के निर्माण से लेकर उनकी पैकेजिंग, परिवहन और बाजार में सप्लाई तक सक्रिय रहता है। जांच एजेंसियों के अनुसार यह गिरोह इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से भी ग्राहकों तक पहुंच बना रहे हैं, जिससे यह खतरा और गंभीर हो गया है।
इसी क्रम में 19 जुलाई 2026 को उत्तराखंड स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) और औषधि प्रशासन विभाग की संयुक्त टीम ने ऊधमसिंहनगर जनपद के बाजपुर स्थित कोविल बायोटैक में छापेमारी कर नकली एलोपैथिक दवाओं के बड़े सिंडिकेट का पर्दाफाश किया। कार्रवाई के दौरान बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश) निवासी धीरेन्द्र पुत्र ब्रह्म सिंह को गिरफ्तार किया गया।
जांच में पता चला कि आरोपी आयुर्वेदिक एवं फूड लाइसेंस की आड़ में बिना वैध औषधि निर्माण लाइसेंस के STADMED, Macleods, Intas, Sun Pharma सहित कई नामी कंपनियों के नाम से नकली एलोपैथिक और जीवनरक्षक दवाइयों का निर्माण एवं पैकेजिंग कर बाजार में सप्लाई कर रहा था।
आरोपी की निशानदेही पर एनएच-74 स्थित गोदाम से करीब एक लाख टैबलेट और 15 हजार सिरप की बोतलें, बड़ी मात्रा में पैकिंग सामग्री, दवा निर्माण मशीनें, अवैध अंग्रेजी शराब, आबकारी होलोग्राम और अन्य सामग्री बरामद की गई। जब्त की गई दवाओं का उपयोग अम्लता, एंटीबायोटिक उपचार, दर्द एवं सूजन, नसों के दर्द, प्रोस्टेट संबंधी रोग, कैल्शियम और विटामिन की कमी तथा आयरन सप्लीमेंट के रूप में किया जाता है।
एसटीएफ ने बताया कि आरोपी के खिलाफ औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं तथा उत्तराखंड आबकारी अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। मामले में शामिल अन्य आरोपियों और पूरे नेटवर्क की तलाश जारी है।
जनस्वास्थ्य से जुड़े इस गंभीर अपराध ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर नकली दवाओं का नेटवर्क बार-बार कैसे सक्रिय हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस कारोबार पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए उत्तराखंड सहित अन्य राज्यों की एजेंसियों को संयुक्त अभियान चलाकर पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करना होगा। तभी आम लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले इस संगठित अपराध पर स्थायी रोक लगाई जा सकेगी।


