राजनीति में संगठन किसी भी पार्टी की आत्मा होता है। पद बदलते हैं, चेहरे आते-जाते हैं, लेकिन संगठन की मज़बूती वही रहती है, यदि उसके कार्यकर्ता निष्ठावान, अनुशासित और ज़मीनी हकीकत से जुड़े हों। दुखद है कि आज कई बार राजनीतिक नियुक्तियाँ होते ही पार्टी के भीतर दो तरह के चेहरे सामने आने लगते हैं—एक, जो निर्णय को स्वीकार कर आगे बढ़ते हैं; और दूसरे, जो अपने चेले-चपेटों के माध्यम से विरोध की हवा बहाने लगते हैं।
संगठन में पद न मिलना स्वाभाविक हताशा ला सकता है, लेकिन इस हताशा को कंजूसीपन, सोशल मीडिया के पंचवचन और विरोध की राजनीति में बदल देना, पार्टी की जड़ों को खोखला करता है। ऐसे भी लोग दिखाई देते हैं जो किसी भी कैंडिडेट को सिर्फ़ “चेहरा देखकर” वोट दे आते हैं। पार्टी की विचारधारा, संगठन की मजबूती, या सामूहिक नीति—इन सबका उनके लिए कोई अर्थ नहीं बचता। यही कारण है कि आज सोशल मीडिया के जमाने में ऐसे तत्व सबसे ज़्यादा सक्रिय हैं और नियुक्त नेताओं पर तंज कसना, व्यंग्य करना ही अपना राजनीतिक धर्म समझ बैठे हैं।
रुड़की की कांग्रेस की स्थिति भी इससे अलग नहीं। जब धरने की घोषणा होती है, जब मीटिंग की बात होती है—तो मुश्किल से 10 लोग भी इकट्ठे नहीं हो पाते। कई बार यह संख्या और भी कम देखने को मिलती है। लेकिन हैरानी तब होती है जब विरोध का अवसर आए—तुरंत भीड़ दिखने लगती है। शहर के नेताओं को एक साधारण मुबारकबाद देना गवारा नहीं, लेकिन देहरादून जाकर फोटो खिंचाने में कोई झिझक नहीं। यह प्रवृत्ति संगठनात्मक निष्ठा और समर्पण की विफलता की सबसे बड़ी पहचान है।
संगठन का अर्थ केवल पद पाना नहीं है; संगठन का अर्थ है भूमि स्तर पर कार्य करना, निर्णयों का सम्मान करना, और केंद्रीय नेतृत्व द्वारा नियुक्त जिम्मेदारियों को स्वीकार कर ईमानदारी से निभाना। यदि कार्यकर्ताओं के भीतर यह मूलभूत भावना न रहे, तो पार्टी चाहे कितनी भी घोषितियाँ कर ले, मीटिंग्स बुला ले, धरने प्लान कर ले—संगठन मज़बूत नहीं हो सकता।
आज जरूरत है निष्ठा और अनुशासन की।
जरूरत है इस बात को समझने की कि किसी भी संगठन की मजबूती एकजुटता, कार्यशीलता और विचारधारा की स्थिरता से आती है।
यदि कार्यकर्ता अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर पार्टी के प्रति समर्पित नहीं होंगे, तो न तो संगठन बदलेगा, और न ही शहर की राजनीतिक तस्वीर।
राजनीति में बदलाव हमेशा शीर्ष से नहीं आता, बल्कि नीचे से आता है—उन कार्यकर्ताओं से, जो बिना शोर किए काम करते हैं, धरना स्थल पर सबसे पहले पहुंचते हैं, मीटिंग में आख़िरी तक टिकते हैं, और हर नियुक्त पदाधिकारी का सम्मान करते हुए आगे की रणनीति पर काम करते हैं। यही वे लोग हैं जो संगठन की असली रीढ़ होते हैं।
यदि रुड़की की कांग्रेस और उसका संगठन स्वयं को मज़बूत करना चाहता है, तो पहला कदम होना चाहिए—
निष्ठा को प्राथमिकता देना, अनुशासन को अपनाना, और सोशल मीडिया की राजनीति से ऊपर उठकर जमीनी कार्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना।
संगठन वही सफल होता है जहाँ कार्यकर्ता पद से पहले कर्तव्य को रखते हैं और आलोचना से पहले आत्ममंथन को। यही किसी पार्टी की असली शक्ति है, और यही भविष्य का रास्ता भी।


