रुड़की। सोनी रोड़।उत्तराखंड की राजनीति में भगवानपुर विधानसभा हमेशा से राजनीतिक समीकरणों का केंद्र रही है। पहले से ही दलित राजनीति का गढ़ मानी जाने वाली यह सीट आज एक परिवार और एक महिला नेतृत्व ममता राकेश के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई दे रही है।
स्वर्गीय सुरेंद्र राकेश के निधन के बाद, ममता राकेश ने न केवल उनकी राजनीतिक विरासत को संभाला बल्कि उसे और अधिक मजबूती भी दी। आज उनके कार्यक्षेत्र में कांग्रेस की पकड़ इतनी मजबूत दिखाई देती है कि भारतीय जनता पार्टी इस इलाके में अपना प्रभाव लगातार बढ़ाने की कोशिशों के बावजूद निर्णायक सफलता हासिल नहीं कर पा रही है।
स्थानीय राजनीति में ममता राकेश की पकड़म, ममता राकेश की सबसे बड़ी ताकत है जमीनी जुड़ाव और महिला नेतृत्व की स्वीकृति।
उन्होंने सिर्फ विधानसभा चुनावों में ही नहीं, बल्कि नगर पंचायत, ब्लॉक और प्रधान चुनावों में भी अपना प्रभाव बनाए रखा है। स्थानीय कार्यकर्ताओं से लेकर ग्रामीण स्तर के जनप्रतिनिधियों तक, उनका संवाद और पहुंच पार्टी के भीतर भी उन्हें एक सशक्त चेहरा बनाती है।
उनका व्यक्तित्व अब “सुरेंद्र राकेश की विरासत” तक सीमित नहीं, बल्कि “ममता राकेश की अपनी पहचान” बन चुका है।
भाजपा की चुनौती और बदले रुख
भारतीय जनता पार्टी के लिए भगवानपुर एक मुश्किल विधानसभा रहीं है। झबरेड़ा से पूर्व विधायक देशराज कर्णवाल के नेतृत्व में भाजपा कोशिशें करने की तैयारी तो कर रही है, लेकिन आंतरिक मतभेद और स्थानीय स्तर पर संगठन की कमजोर पकड़ भाजपा को अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी। अब खबर है कि देशराज कर्णवाल अभी भी भगवानपुर और झबरेड़ा के बीच में ही फसे नजर आते हैं, जबकि दूसरी ओर सुबोध राकेश, जो कभी ममता राकेश के राजनीतिक विरोधी और पारिवारिक प्रतिद्वंद्वी भी माने जाते थे, उनके साथ नजदीकियाँ बढ़ा रहे हैं।राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि सुबोध राकेश संभवतः ज्वालापुर सीट की ओर अपना रुख कर सकते हैं। सवाल यह है क्या यह ममता राकेश के बढ़ते प्रभाव का परिणाम है, या भाजपा की रणनीतिक चाल, जो उन्हें नए क्षेत्र में आजमाना चाहेगी ?
परिवार, प्रतिद्वंद्विता और राजनीतिक रहस्य
राकेश परिवार की राजनीति हमेशा से रुड़की, झबरेड़ा और भगवानपुर के राजनीतिक समीकरणों का हिस्सा रही है। कभी एक मंच पर खड़े रहने वाला परिवार आज अलग-अलग दलों में खड़ा है पर प्रभाव दोनों ओर बना हुआ है। सियासी चर्चाओं में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या परिवार की यह प्रतिद्वंद्विता अंततः फिर एकजुटता में बदलेगी, या 2027 में भी भगवानपुर एक पारिवारिक राजनीतिक टकराव का गवाह बनेगा?
2027 का चुनाव: सवाल कई, जवाब वक्त देगा
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है। जहां भाजपा संगठन नए चेहरों की तलाश में है, वहीं कांग्रेस अपने पुराने नेतृत्व पर भरोसा बनाए हुए है।ममता राकेश के लिए यह चुनाव सिर्फ एक सीट का नहीं, बल्कि अपनी नेतृत्व क्षमता को पुनः सिद्ध करने का अवसर होगा। वहीं सुबोध राकेश के लिए यह समय यह तय करेगा कि क्या भाजपा के मंच से वे नई पहचान बना पाएंगे या नहीं।


