शरीर की हरकतों से खुद बिजली बनाएगा स्मार्ट बैंडेज, घाव भरने में मिलेगी मदद
आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने विकसित की 3D-MIDAS तकनीक, बैटरी-तार की जरूरत नहीं; प्रयोगों में 90-95% तक घाव भरने के उत्साहजनक परिणाम

रुड़की, 11 सितंबर। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के शोधकर्ताओं ने इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईएनएसटी), मोहाली के सहयोग से एक ऐसा स्मार्ट इलेक्ट्रॉनिक बैंडेज विकसित किया है, जो शरीर की प्राकृतिक गतिविधियों से ही विद्युत संकेत उत्पन्न कर सकता है। यह विद्युत उत्तेजना घाव भरने की प्रक्रिया में सहायक हो सकती है। खास बात यह है कि इसके लिए बैटरी, तार अथवा किसी बाहरी ऊर्जा स्रोत की आवश्यकता नहीं होती।
शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को 3D-MIDAS (3D Monolithic Integrated Dipolar-Ionic Fibrous Architectural Scaffold) नाम दिया है। यह लचीली रेशेदार संरचना शरीर की गतिविधियों के दौरान खिंचने से उत्पन्न यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत उत्तेजना में बदलती है। यानी शरीर की सामान्य हलचल ही भविष्य में बैंडेज को ऊर्जा उपलब्ध कराने का माध्यम बन सकती है।
घाव भरने में विद्युत संकेत की भूमिका
शोधकर्ताओं के अनुसार, त्वचा के क्षतिग्रस्त होने पर घाव भरने की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित होती है। इस दौरान कोशिकाओं को दिशा देने वाले प्राकृतिक विद्युत संकेत भी बाधित हो सकते हैं। 3D-MIDAS को इस तरह तैयार किया गया है कि यह घाव वाले स्थान पर विद्युत उत्तेजना उपलब्ध कराने के साथ-साथ लचीली और वायु-संचार योग्य संरचना प्रदान करे। इसकी छिद्रयुक्त बनावट घाव से निकलने वाले द्रव के प्रबंधन में भी मदद करती है।
यह स्कैफोल्ड अपनी मूल लंबाई के करीब 800 प्रतिशत तक खिंच सकता है, जिससे शरीर की गतिविधियों के साथ इसके अनुकूल होने की क्षमता बढ़ जाती है।
प्रयोगों में मिले उत्साहजनक परिणाम
शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला और पशु अध्ययनों के माध्यम से तकनीक का परीक्षण किया। प्रयोगशाला परीक्षणों में 3D-MIDAS के इस्तेमाल से नियंत्रण परिस्थितियों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक कोशिका प्रसार और 2.5 गुना अधिक कोशिका प्रवासन देखा गया। दोनों प्रक्रियाएं ऊतक की मरम्मत में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
पशु अध्ययनों में भी परिणाम उत्साहजनक रहे। 3D-MIDAS ड्रेसिंग से उपचारित घावों में 13 से 15 दिनों के भीतर लगभग 90-95 प्रतिशत तक घाव बंद होने की स्थिति देखी गई। इसके साथ ही नई रक्त वाहिकाओं के निर्माण में वृद्धि, ऊतक संरचना में सुधार और कोलेजन के अधिक जमाव के संकेत मिले।
चलते-फिरते भी बनती रही बिजली
शोध टीम ने यह भी जांच की कि क्या बैंडेज वास्तविक शारीरिक गतिविधियों से विद्युत आउटपुट पैदा कर सकता है। स्वतंत्र रूप से गतिविधियां करने वाले चूहों के घावों पर लगाए जाने पर ड्रेसिंग ने बिना किसी बाहरी यांत्रिक उत्तेजना के लगातार विद्युत आउटपुट उत्पन्न किया।
उपकरण ने 500 बार खिंचाव चक्रों के दौरान स्थिर विद्युत प्रदर्शन किया। वहीं दीर्घकालिक परीक्षण में करीब तीन महीने तक स्थिर प्रदर्शन दर्ज किया गया। इससे बार-बार होने वाली शारीरिक गतिविधियों को सहन करने की इसकी क्षमता का संकेत मिलता है।
दूरदराज और आपातकालीन परिस्थितियों में हो सकता है उपयोग
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. के.के. पंत ने कहा कि उन्नत सामग्रियों और अंतर्विषयक अनुसंधान को स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण चुनौतियों के समाधान से जोड़ना इस शोध की बड़ी उपलब्धि है। प्राकृतिक शारीरिक गतिविधियों का उपयोग कर घाव देखभाल की तकनीक को ऊर्जा देने का विचार भविष्य में सरल, लचीले और स्व-संचालित समाधानों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
प्रधान अन्वेषक प्रो. कौशिक पारिदा ने कहा कि मौजूदा विद्युत-आधारित घाव भरने वाली कई प्रणालियों में बाहरी ऊर्जा स्रोत की आवश्यकता होती है। 3D-MIDAS इस सीमा को दूर करने की दिशा में प्रयास है, जिसमें शरीर की गतिविधियां ही विद्युत उत्तेजना उत्पन्न करने के लिए आवश्यक यांत्रिक ऊर्जा उपलब्ध कराती हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, भविष्य में यह तकनीक दूरस्थ स्वास्थ्य सेवाओं, आपातकालीन और आपदा राहत परिस्थितियों में उपयोगी हो सकती है। हालांकि, नियमित चिकित्सा उपयोग से पहले मानवों पर नैदानिक परीक्षण और व्यापक सत्यापन आवश्यक होगा।
‘नैनो एनर्जी’ में प्रकाशित हुआ शोध
यह शोध पीयर-रिव्यूड जर्नल Nano Energy में “3D monolithic integrated dipolar-ionic fibrous scaffold for self-powered wound healing and exudate management” शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। शोध Volume 157 (2026), Article 112266 में प्रकाशित हुआ है।
शोध दल में आईआईटी रुड़की के Department of Polymer and Process Engineering और Center for Sustainable Energy से प्रो. कौशिक पारिदा तथा विशु वर्मा, रोमि गर्ग, सायंती मल्लिक और अनीश अली शामिल रहे। आईएनएसटी मोहाली की Chemical Biology Unit से कनिका, जट्टिन कुमार और रेहान खान ने भी शोध में योगदान दिया। अध्ययन को ANRF, ICMR, DST और PMRF सहित भारत सरकार की विभिन्न अनुसंधान योजनाओं से सहयोग मिला है।


