दीपावली के पावन पर्व के अगले दिन आने वाली गोवर्धन पूजा भारतीय संस्कृति का एक ऐसा त्योहार है जो विशेष रूप से ग्रामीण अंचलों में बड़े श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह किसानों के जीवन, उनके परिश्रम और उनके सहजीवन का प्रतीक भी है।
किसानों की परंपरा रही है कि इस दिन वे अपने पशुओं की पूजा करते हैं — गाय, बैल, भैंस और वे सभी जानवर जो खेतों में उनके साथी बनकर काम करते हैं। किसान समझता है कि उसके जीवन में जितनी अहम भूमिका उसके हाथों की है, उतनी ही उसके पशुधन की भी है। यही कारण है कि गोवर्धन पूजा का दिन किसान अपने इन मूक साथियों को सम्मान देने और आभार प्रकट करने के लिए समर्पित करता है।
उत्तराखंड किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इस अवसर पर कहा कि
“गोवर्धन पूजा केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह किसान के विश्वास और संघर्ष का प्रतीक है। आज भी किसान अपने खेत, अपनी फसल और अपने पशुधन को भगवान श्रीकृष्ण के भरोसे छोड़ देता है। जिस तरह भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर गोपालों की रक्षा की थी, उसी तरह आज किसान भी अपने जीवन में हर कठिनाई से जूझते हुए उसी ईश्वर पर भरोसा रखता है।”
उन्होंने आगे कहा कि आज की सरकारें किसानों को सुविधाओं का भरोसा तो देती हैं, लेकिन व्यवहार में उनका शोषण लगातार जारी है। किसान का असली मालिक और पालनहार अब भी प्रभु श्रीकृष्ण ही हैं — जो उसकी मेहनत की रक्षा करते हैं, उसकी फसल को फलने-फूलने का वरदान देते हैं।
गोवर्धन पूजा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह त्योहार पशुपालन और कृषि दोनों के संगम को दर्शाता है। किसान अपने खेत में प्रयोग होने वाले संसाधनों — जैसे ट्रैक्टर, ट्रॉली, हल, बैल — सभी की पूजा करता है। यह उस भावना का प्रतीक है जिसमें किसान अपने हर औज़ार को भगवान तुल्य मानता है।
किसान का जीवन संघर्षों से भरा होता है, लेकिन फिर भी वह आस्था और श्रम को कभी नहीं छोड़ता।
वह जानता है —
“भगवान भरोसे चलता है किसान,
पसीने से सींचता है अपनी जान।”
इसी विश्वास और समर्पण के साथ गोवर्धन पूजा हर वर्ष किसानों के जीवन में नए उत्साह, नई उम्मीद और आत्मबल का संचार करती है।
यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि धरती का सबसे बड़ा पूजक वही है — जो उसे हर दिन अपने श्रम से सींचता है।


