सपने आसान नहीं होते—खासकर तब, जब वे ग्रामीण मिट्टी में जन्म लें और संसाधनों के अभाव में पले-बढ़े हों। उत्तराखंड के एक किसान परिवार से आने वाले नवनीत कुमार की कहानी इसी सच्चाई का जीवंत उदाहरण है।

1998 में कक्षा छठी से शूटिंग बॉल खेलना शुरू करने वाले नवनीत को अपने जीवन के सबसे बड़े सपने को साकार करने में पूरे 28 साल लग गए।
ग्रामीण अंचल में पले-बढ़े नवनीत ने रुड़की के पॉलिटेक्निक हॉस्टल के मैदान में बिना किसी सरकारी सहायता, बिना कोच और बिना तकनीकी ज्ञान के अभ्यास किया। हालात ऐसे रहे कि कई बार प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए रेल टिकट तक नहीं होता था—जनरल डिब्बे में लंबा सफर, तीन-तीन महीने घर से दूर रहकर फेडरेशन, स्टेट और नेशनल स्तर की प्रतियोगिताएं खेलना, तब जाकर जीवन की गाड़ी आगे बढ़ती रही।
यह संघर्ष सिर्फ शारीरिक नहीं था, बल्कि मानसिक और आर्थिक भी। नवनीत की कहानी इस बात को साफ तौर पर उजागर करती है कि हमारे देश में प्रतिभा की कमी नहीं है, कमी है तो संसाधनों, सम्मान और समय पर मिलने वाली मदद की।
दिल्ली के Jawaharlal Nehru Stadium में आयोजित शूटिंग बॉल विश्व कप में जब नवनीत कुमार ने भारत की टीम का प्रतिनिधित्व किया, तो वह किसी सिस्टम की देन नहीं, बल्कि अपने दम पर वहां तक पहुंचे एक साधारण किसान परिवार के बेटे की जीत थी।
विश्व कप में सिल्वर मेडल (दूसरा स्थान) हासिल करना उनके संघर्ष की सबसे बड़ी पहचान बना।
मेडल जीतने के बाद दोस्तों और परिवार में मिठाइयां बंटी, चेहरे पर मुस्कान आई—लेकिन इसके आगे जीवन वही आम संघर्षों वाली राह पर खड़ा दिखता है। न कोई सरकारी आश्वासन, न भविष्य की ठोस योजना, न ही प्रतिभा को आगे बढ़ाने की स्पष्ट दिशा।
नवनीत कुमार की कहानी हमें आईना दिखाती है—
जहां प्रतिभा आज भी संघर्ष कर रही है,
जहां सपनों को पूरा करने में आधी जिंदगी निकल जाती है,
और जहां मेडल के बाद भी खिलाड़ी सिस्टम से अकेला रह जाता है।
यह सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय खेल व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा सवाल है—
क्या हम सिर्फ जीत का जश्न मनाएंगे, या जीत तक पहुंचने वाले संघर्ष को भी सम्मान और सहारा देंगे?
नवनीत कुमार ने अपने दम पर इतिहास रचा है। अब जिम्मेदारी सिस्टम की है—ताकि आने वाली पीढ़ियों को अपने सपनों के लिए 28 साल का इंतज़ार न करना पड़े।


