रुड़की। सोनी रोड़।
श्री रामलीला समिति बी.टी. द्वारा आयोजित भव्य रामलीला में कल नेहरू स्टेडियम में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के वध के अद्भुत मंचन से समूचा वातावरण जयघोष से गूंज उठा। आज उसी श्रृंखला में लंका विजय के बाद प्रभु श्रीराम अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हुए दिखाई दिए।
युद्ध समाप्ति के उपरांत प्रभु ने विभीषण को लंका का राजसिंहासन सौंपा और अपने वचन के अनुसार अयोध्या लौटने का संकल्प लिया। प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता संग सरयू नदी तट पर अयोध्या नगरी पहुंचे तो अयोध्या धाम आनंद और उल्लास से भर गया।
माताओं से मिलन
ज्यों ही प्रभु राम महल प्रांगण में प्रवेश करते हैं, उनकी माताएँ — कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा जी — अश्रुपूरित नेत्रों से दौड़कर अपने लाल से मिलती हैं।
श्लोक (वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड):
“समीपं उपजग्मुश्च मातरः परितः स्थिता:।
राघवं संश्रिताः सर्वाः पुत्रस्नेहमनोरथाः॥”
जब श्रीराम अयोध्या लौटे तो उनकी माताएँ अपार पुत्रस्नेह से अभिभूत होकर उन्हें आशीर्वाद देने दौड़ीं और गले लग गईं।
भरत मिलाप का दृश्य
इसके पश्चात समूची अयोध्या के हृदय को आंदोलित करने वाला दृश्य घटित हुआ। भरत जी ने प्रभु राम को देखते ही अपने प्राणों के समान प्रिय भ्राता को गले से लगा लिया। उनके नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी।
श्लोक (अयोध्याकाण्ड):
“भरतः प्राञ्जलिर्भूत्वा शिरसा राघवं नतः।
दृष्ट्वा तमग्रतः रामं निपपात महीतले॥”
भरत जी folded hands से राम जी के चरणों में नतमस्तक हुए और प्रभु को देखते ही भूमि पर गिर पड़े। भावविह्वल भरत को स्वयं राम ने उठाकर गले से लगाया।
जनता का उत्साह और आशीर्वाद
इस मिलन के भावुक दृश्य से उपस्थित भक्तगण और दर्शकगण की आँखें नम हो गईं। “जय श्रीराम” के घोष से गूंजता हुआ बी.टी. का परिसर मानो अयोध्या नगरी का रूप धारण कर चुका था।
रामराज्य की ओर संकेत
रामायण के अनुसार भरत ने प्रभु से कहा कि अयोध्या बिना राम के शून्य हो गई थी। आज आपके आगमन से अयोध्या पुनः जीवन्त हो गई है। गुरु वशिष्ठ जी ने प्रभु श्रीराम का राजतिलक कर उन्हें अयोध्या का अधिपति घोषित किया।
“सर्वे प्रहृष्टाः मुदिताः प्रजाः सुखसमृद्धिभिः।
रामराज्ये सुखं चेरुर्न दुःखं कंचिदागमत्॥”
रामराज्य में प्रजा प्रसन्न और सुखी थी। हर व्यक्ति संतुष्ट था और किसी को कोई दुःख नहीं था।
आज के रामलीला मंचन में भरत मिलाप का दृश्य न केवल प्रभु राम और भरत के भ्रातृ-प्रेम का दिग्दर्शन कराता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि धर्म, त्याग और भाईचारे से ही समाज और राष्ट्र का कल्याण संभव है।


