त्योहार की असली रोशनी – सादगी, संवेदना और स्वदेशी भावना में है, सचिन गुप्ता एवं पूजा गुप्ता का संदेश “त्योहार दिखावे से नहीं, दिलों को जोड़ने से पवित्र बनते हैं” ( सचिन गुप्ता, गोडविन लाइव के साथ)
रुड़की।
त्योहार केवल रौशनी और मिठास का प्रतीक नहीं होते, बल्कि यह संस्कृति, संवेदना और सामूहिकता के प्रतीक हैं। हर वर्ष जब हिंदू सनातन धर्म के प्रमुख पर्व आते हैं, तो कभी जल संरक्षण, कभी पटाखों और प्रदूषण के मुद्दे पर बहस खड़ी हो जाती है। इसी विषय पर रुड़की के युवा उद्योगपति और राजनीति के उभरते चेहरे सचिन गुप्ता ने “गॉडविन लाइव” के अंतर्गत एक विचारोत्तेजक संदेश साझा किया, जिसने समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया।
सचिन गुप्ता ने कहा —
“हर बार जब हमारे त्योहार आते हैं, तो चर्चाएं पटाखों और प्रदूषण तक सीमित रह जाती हैं। परंतु क्या यह सवाल उन युद्धों से नहीं पूछा जाता है, जो दुनिया के कई हिस्सों में प्रतिदिन हजारों किलो बारूद छोड़ते हैं? रूस-यूक्रेन, इज़राइल-हमास या अन्य क्षेत्रों में चल रहे संघर्षों से क्या प्रदूषण नहीं होता? अगर नहीं, तो फिर केवल हमारी फुलझड़ियों को दोष क्यों?”
उन्होंने कहा कि त्योहारों का मूल उद्देश्य आनंद, संयम और आत्मिक शांति है।
“मैं युवाओं और बच्चों से कहना चाहता हूं कि पटाखे जलाना गलत नहीं है, लेकिन मर्यादा में रहना आवश्यक है। इतना कि आपके आसपास के जानवर, बुजुर्ग और बीमार लोग प्रभावित न हों। त्योहारों का अर्थ दिखावा नहीं, आपसी प्रेम और साझा खुशी है।”
सचिन गुप्ता ने आगे कहा कि दीपावली हो या कोई भी पर्व, इनका वास्तविक उद्देश्य एकता, परिवार और स्वदेशी भावना को सशक्त करना है।
“हम अपने त्योहारों को अर्थपूर्ण बना सकते हैं जब हम स्थानीय दुकानदारों से खरीदारी करें, स्वदेशी उत्पाद अपनाएं और अपने आसपास के लोगों की खुशियों में शामिल हों। जब हर दीपक किसी के जीवन में रोशनी बनता है, तभी त्योहार का अर्थ पूर्ण होता है।”
इस अवसर पर पूजा गुप्ता ने कहा —
“पर्यावरण की रक्षा हमारी जिम्मेदारी है, पर खुशी और परंपरा के बीच संतुलन भी उतना ही आवश्यक है। त्योहारों को बोझ नहीं, उत्सव बनाइए। जब खुशी सादगी के साथ मनाई जाती है, तो वह और गहरी हो जाती है।”
“गॉडविन लाइव” लगातार ऐसे विचार प्रस्तुत कर रहा है, जो केवल संवाद नहीं, बल्कि समाज में संवेदनशील सोच का आंदोलन बन रहे हैं।
सचिन और पूजा गुप्ता का यह संदेश आज की पीढ़ी को यह याद दिलाता है कि —
त्योहारों की असली रौनक पटाखों में नहीं, अपनों के मुस्कुराते चेहरों में है।


