दिवाली की चमक में छिपा जहर,,अब वक्त है बदलाव का
लेखक डॉ. नरेश कुमार, मुख्य संरक्षक, रोड युवा चेतना सभा (रजि) सहारनपुर
दिवाली का पांच दिनी पर्व आरंभ हो चुका है। यह उत्सव केवल दीपों और सजावट का नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, पारिवारिक एकता और सादगीपूर्ण आनंद का प्रतीक है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की स्मृति में आरंभ हुआ यह पर्व आज अपनी मूल भावना से कहीं दूर होता जा रहा है।
जहाँ पहले लोग मिट्टी के दीयों में तेल डालकर, एक साथ बैठकर, प्रेमपूर्वक मिठाई बांटकर दीपोत्सव मनाते थे, वहीं अब यह पर्व प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा और बाजारवाद की चकाचौंध में खोता जा रहा है।
त्योहार नहीं, व्यापार बन गया है दीपोत्सव
आज दीपावली के नाम पर उपहार देने और दिखावे की संस्कृति तेजी से बढ़ी है। मिठाई, गिफ्ट और महंगे पैकेजों की दौड़ ने आम परिवारों पर आर्थिक दबाव डाल दिया है। त्योहार अब सामाजिक मेलजोल से ज्यादा कर्ज और खर्च का प्रतीक बनता जा रहा है।
कंपनियां महीनों पहले अपनी योजना बनाकर बाजार में उतर जाती हैं — लाखों टन मिठाइयाँ, चॉकलेट और गिफ्ट पैक तैयार होते हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि इस दौड़ में मिलावटखोरों की चांदी हो गई है।
हर साल की तरह इस बार भी प्रशासन की छापेमारी में नकली मावा, मिलावटी पनीर, कैमिकल युक्त रसगुल्ले और दूषित मिठाईयाँ बड़ी मात्रा में पकड़ी जा रही हैं। सवाल यह है कि — क्या हम सचमुच अपने प्रियजनों को मिठास दे रहे हैं या जहर बाँट रहे हैं?
एक सादगीपूर्ण मुहिम की जरूरत
अब वक्त आ गया है कि समाज एकजुट होकर “सादगीपूर्ण दीपावली” की मुहिम शुरू करे। उपहारों की जगह शुभकामनाओं के संदेश भेजे जाएँ — लिखित या डिजिटल माध्यम से। इससे न केवल अनावश्यक खर्च और मिलावटी मिठाईयों का प्रचलन घटेगा, बल्कि त्योहार की वास्तविक भावना — सादगी, श्रद्धा और सामाजिक एकता — फिर जीवंत होगी।
दिवाली हमारी हो, बाज़ार की नहीं
दिवाली हमारा पर्व है, कंपनियों और मिलावटखोरों का नहीं।
सड़क किनारे टेंट लगाकर नकली मिठाई बेचने वाले चार दिन में लाखों कमा लेते हैं और हमें बीमारियाँ देकर चले जाते हैं। हमें तय करना होगा कि हम उनकी दिवाली मनाएँगे या अपनी संस्कृति की।
आइए, इस दीपावली एक संकल्प लें —
ना दिखावा, ना मिलावट, ना फिजूल खर्च — बस प्रेम, सादगी और स्वच्छता के दीप जलाएँ।
यही सच्चा दीपोत्सव होगा — समाज, स्वास्थ्य और सद्भाव के लिए


