भारत—एक ऐसा देश जिसे दुनिया “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” कहती है। सस्ती और किफायती दवाइयां उपलब्ध कराने में भारत का कोई सानी नहीं। पर यही देश आज दवा निर्माण में लापरवाही, भ्रष्टाचार और कमजोर निगरानी के कारण अपने ही नागरिकों की जिंदगी को खतरे में डाल रहा है।
तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर के बाहरी इलाके में स्थित श्रीसन फार्मास्यूटिकल्स का मामला देश की दवा व्यवस्था की सच्चाई सामने लाता है। तमिलनाडु ड्रग कंट्रोल विभाग ने पाया कि कंपनी ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट के तहत 364 बार नियमों का उल्लंघन किया था। इसी कंपनी द्वारा निर्मित कफ सिरप मध्य प्रदेश और राजस्थान में 25 बच्चों की जान ले गया। जांच में पाया गया कि इस सिरप में डाइएथिलीन ग्लाइकोल जैसा जहरीला तत्व मौजूद था—जो किडनी और लीवर को गंभीर नुकसान पहुंचाता है।
यह कोई पहली या आखिरी घटना नहीं है। गाम्बिया, उज्बेकिस्तान से लेकर उत्तराखंड और छिंदवाड़ा तक, ऐसी घटनाओं की एक लंबी सूची है। हर जगह कहानी एक जैसी है—छोटे स्तर पर उत्पादन, कमजोर निगरानी, और हादसे के बाद सुस्त कार्रवाई।
भारत में दवा निर्माण का नियामक ढांचा अब “पुराना” और “बिखरा हुआ” हो चुका है। राज्यों के स्तर पर दवा निरीक्षण की प्रणाली न के बराबर है, और जहां है भी, वहां राजनीतिक प्रभाव या भ्रष्टाचार जांच को कमजोर बना देता है।
सरकार की प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के तहत सस्ती जेनेरिक दवाइयां जनता तक पहुंचाई जा रही हैं। यह योजना अपने आप में सराहनीय है — इससे लाखों गरीबों को राहत मिली और अनुमानित 30,000 करोड़ रुपये की बचत हुई। लेकिन सवाल यह है कि क्या सस्ती दवा सुरक्षित भी है?
गुणवत्ता नियंत्रण की अनदेखी ने दवा उद्योग को अविश्वसनीय बना दिया है।
जेनेरिक दवाइयों में अक्सर मूल तत्व (Active Ingredient) या तो निर्धारित मात्रा में नहीं होते या फिर गलत फॉर्मूलेशन से उनका असर बहुत कम हो जाता है। एक अध्ययन के अनुसार, 22 जेनेरिक एंटी-फंगल दवाइयों में केवल 29% ही दो सप्ताह में अपेक्षित प्रभाव दिखा पाईं। इसका अर्थ है कि 71% दवाइयां शरीर में ठीक से काम नहीं कर पाईं — यानी इलाज के नाम पर धोखा।
उत्तराखंड में भी यह खतरा नजर आ चुका है।
रुड़की और उसके आसपास फर्जी या निम्न गुणवत्ता की दवाइयां बनाने वाले कारखानों पर कई बार छापे पड़ चुके हैं। औद्योगिक प्रोत्साहन के नाम पर कुछ कंपनियों को ऐसी ढील मिल जाती है, जो अंततः स्वास्थ्य सुरक्षा पर भारी पड़ती है।
आज यह सवाल देश के हर नागरिक को पूछना चाहिए —
> “क्या हमारी सस्ती दवाइयां सच में हमें स्वस्थ बना रही हैं या धीरे-धीरे हमारी जिंदगी को खतरे में डाल रही हैं?”
भारत ने जेनेरिक दवाइयों के माध्यम से वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बनाई है, लेकिन अगर गुणवत्ता नियंत्रण पर ध्यान नहीं दिया गया तो यही पहचान कल शर्मिंदगी का कारण बन सकती है।


