भारत में अक्सर मूलभूत मुद्दों जैसे—सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य—को लेकर जितना जागरूक और सक्रिय होना चाहिए, उतना हम नहीं होते। लेकिन भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्रीयता जैसे भावनात्मक मुद्दों पर हम जल्दी उबल पड़ते हैं। इसका ताजा उदाहरण महाराष्ट्र के ठाणे में मनसे कार्यकर्ताओं का हिन्दी विरोध प्रदर्शन है, जबकि वही शहर और राज्य कई ज़रूरी समस्याओं से जूझ रहा है।
असल चिंता की बात:
- टूटी सड़कें, हर बरसात में जान लेती हैं।
- सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, दवाएं नहीं — लोग दम तोड़ते हैं।
- सरकारी स्कूलों में शिक्षक नहीं, भविष्य अधूरा रह जाता है।
- लेकिन इन मुद्दों पर कोई रैली, कोई ‘हड़ताल’, कोई ‘तोड़फोड़’ नहीं।
भावनात्मक मुद्दों की राजनीति:
- हिन्दी बोले या ना बोले — ये व्यक्तिगत चुनाव हो सकता है, जब तक किसी पर थोप न जाए।
- पर इसे “हम बनाम वो” बनाकर असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जाता है।
- लोग बहकावे में आ जाते हैं क्योंकि “भावना को उकसाना आसान है, समाधान खोजना मुश्किल।”
समाधान की दिशा:
- भाईचारे और सहयोग से ही भारत आगे बढ़ सकता है।
- भाषा, धर्म, क्षेत्र — ये विविधता में एकता की मिसाल हो सकते हैं, विघटन का कारण नहीं।
- विकसित देश वही बनते हैं, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मुद्दों पर खड़े होते हैं — न कि नारेबाज़ी पर।
एक मार्मिक संदेश:
“जिस देश में टूटी सड़कें और टूटी उम्मीदें मुद्दा न बनें, लेकिन भाषा का लहजा युद्ध का कारण बन जाए, वहां विकास नहीं, विनाश बोलता है।”


