देश फिर एक बार सन्नाटा ओढ़े बैठा है।
राजस्थान के जैसलमेर में हुई बस दुर्घटना में 20 से अधिक लोगों की दर्दनाक मौत और कई घायल — यह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की लापरवाही और भ्रष्टाचार का चेहरा है। यह घटना हमें झकझोरती है, पर अफसोस — केवल कुछ दिनों तक। फिर सब वैसा ही चलता रहता है।
मौत सस्ती है, सिस्टम महंगा
हमारे यहाँ जान की कीमत कितनी सस्ती है, यह हर सड़क हादसे के बाद की कार्रवाई से समझा जा सकता है। हादसे होते हैं, बयान दिए जाते हैं, जांच के आदेश जारी होते हैं, और फिर सब ठंडे बस्ते में चला जाता है। कुछ परिवारों को मुआवजा मिल जाता है, कुछ को सांत्वना — लेकिन उनकी ज़िंदगी का वो खालीपन कौन भरेगा जिनके बच्चे, पति या पत्नी इस हादसे में चले गए?
मौत की दौड़ में लापरवाही
आरटीओ, परिवहन विभाग और स्थानीय प्रशासन — सबकी भूमिका सवालों के घेरे में है। कितनी बसें बिना फिटनेस चेक, बिना वैध परमिट, बिना नियमित रूट निरीक्षण के सड़कों पर दौड़ रही हैं? कितनी गाड़ियाँ ऐसे चालकों के हाथ में हैं जो थके हुए हैं, नशे में हैं या बिना लाइसेंस के हैं? लेकिन जब तक हादसा नहीं होता, तब तक किसी को परवाह नहीं।
और जब हादसा हो जाता है — तो “दुर्घटना” कहकर हम उसे किस्मत का खेल मान लेते हैं।
भ्रष्टाचार का अड्डा बना परिवहन तंत्र
आरटीओ दफ्तर अब “सड़क सुरक्षा” का प्रतीक नहीं, बल्कि “रिश्वत और सिफारिश” का ठिकाना बन चुके हैं। फिटनेस रिपोर्ट कागज़ पर पूरी, वाहनों की जांच सिर्फ़ रजिस्टर में दर्ज। रूट परमिट बिना जांच के जारी, और चालकों की पात्रता केवल “पहचान” पर तय होती है — “नियमों” पर नहीं। ऐसे में हादसे होना कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि योजनाबद्ध हत्या जैसी स्थिति बन जाती है।
क्या मुआवज़ा ही इंसाफ़ है?
क्या बयान देना ही जिम्मेदारी निभाना है?
क्यों हर मौत के बाद कुछ अफसर निलंबित होकर फिर बहाल हो जाते हैं?
क्यों “सड़क सुरक्षा सप्ताह” केवल दिखावे तक सीमित है?
और आखिर कब तक हमारे नागरिकों की ज़िंदगियाँ इस भ्रष्ट व्यवस्था के पहियों तले पिसती रहेंगी?
अब सुधार नहीं, जवाबदेही चाहिएय ह समय केवल दुख व्यक्त करने का नहीं — जवाबदेही तय करने का है।
हर आरटीओ दफ्तर का ऑडिट होना चाहिए,
हर बस की डिजिटल फिटनेस रिपोर्ट अनिवार्य होनी चाहिए,
हर चालक की सेवा और स्वास्थ्य जांच नियमित होनी चाहिए,
और सबसे जरूरी — भ्रष्ट अफसरों और ऑपरेटरों पर हत्या जैसा मामला दर्ज होना चाहिए,
क्योंकि उनकी लापरवाही किसी की जान ले रही है।
हमारे देश में सड़कें विकास का प्रतीक कही जाती हैं,
पर जब उन्हीं सड़कों पर लाशें बिछी मिलती हैं,
तो यह विकास नहीं, विनाश की परिभाषा बन जाता है।
अब वक्त है कि जनता सवाल पूछे, मीडिया आवाज़ उठाए,
और सरकारें कागज़ी नहीं, ज़मीनी जवाबदेही दिखाएँ।


