भारतीय राजनीति के इस दौर में अगर दो पार्टियों की कार्यप्रणाली को सबसे अलग और स्पष्ट तरीके से देखा जा सकता है, तो वह हैं — कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी।
दोनों के पास अपना इतिहास, अपना संघर्ष और अपने आदर्श हैं, लेकिन आज के भारत में दोनों के रास्ते, दृष्टि और रणनीति एक-दूसरे से बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं।
कांग्रेस: जहां ‘केंद्र’ से सवाल करना पाप है
कांग्रेस पार्टी का सबसे बड़ा संकट नेतृत्व के नाम पर ‘निष्ठा बनाम निष्ठुरता’ में फंसा हुआ है। यहां कोई भी नेता अगर केंद्रीय नेतृत्व पर सवाल उठाने की हिम्मत करता है, तो उसे पार्टी से निष्कासन, तिरस्कार या राजनीतिक वनवास झेलना पड़ता है। चाहे वह राज्य स्तर का बड़ा नेता हो या कोई पुराने कार्यकर्ता —
“ऊपर से सवाल मत करो” कांग्रेस का यह अनलिखा नियम बन चुका है। यही कारण है कि पार्टी में आत्म-मंथन की जगह आत्म-समर्पण की संस्कृति पनप गई है। नेता बोलना बंद कर चुके हैं, और जो बोलते हैं, वे बाहर कर दिए जाते हैं।
यह वही पार्टी है जिसने आज़ादी दिलाई, लोकतंत्र को दिशा दी, लेकिन अब उसी पार्टी के भीतर लोकतंत्र की आवाज़ घुट रही है।
भाजपा: जहां विरोधी भी अवसर हैं
वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी की रणनीति बिल्कुल उलट है।
भाजपा विरोधियों को दुश्मन नहीं, बल्कि संभावना के रूप में देखती है।
अगर कोई नेता जनता में प्रभावशाली है, चाहे उसने कल तक भाजपा की आलोचना ही क्यों न की हो भाजपा उसे अपने पाले में लाने में देर नहीं करती। ज्योतिरादित्य सिंधिया इसका बड़ा उदाहरण हैं।कभी कांग्रेस के युवा चेहरों में गिने जाने वाले सिंधिया आज भाजपा में केंद्रीय मंत्री हैं। हेमंत विश्व शर्मा असम में कांग्रेस की अनदेखी के बाद भाजपा में आए और आज पूरे पूर्वोत्तर की राजनीति भाजपा के रंग में रंगी है। कपिल मिश्रा जैसे दिल्ली के नेता, जो कभी केजरीवाल की विचारधारा से जुड़े थे, आज भाजपा के आक्रामक चेहरों में गिने जाते हैं।
यह लचीलापन ही भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन गया है। भाजपा जानती है कि “राजनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं, केवल लक्ष्य स्थायी होता है — सत्ता।” और इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वह अपने संगठन और चुनावी स्टफ दोनों को अलग रखती है।
उत्तराखंड का परिदृश्य -कांग्रेस की उलझन और भाजपा की रणनीति
अगर उत्तराखंड की राजनीति को देखें तो यह तस्वीर और स्पष्ट दिखाई देती है। कांग्रेस के पास आज भी अनुभव, वरिष्ठता और संगठन की जड़ें हैं, लेकिन उनमें दिशा और संवाद की कमी है। पार्टी के अंदर गुटबाज़ी, अहंकार और पारस्परिक अविश्वास ने जमीनी कार्यकर्ताओं को हाशिए पर धकेल दिया है।
हरीश रावत जैसे अनुभवी नेता जिन लोगों के विरोध से अपनी सरकार गंवा बैठे, आज उन्हीं लोगों के साथ मंच साझा करने में असहज दिखते हैं। दूसरी ओर, भाजपा किसी भी नेता को, चाहे वह कल तक विरोधी रहा हो,अगर वह चुनाव जिता सकता है तो उसे स्वीकारने में कभी हिचकिचाती नहीं।
भाजपा का फ़ॉर्मूला साफ है पहले सरकार बनाओ, संगठन बाद में संभाल लेंगे।” यहां पर सरकार के लिए अलग सस्टफ और संगठन के लिए अलग नेता.।
देश की तरह रुड़की में भी महाभारत जैसी कांग्रेस की हालत
अगर बात अपने शहर रुड़की की करें, तो कांग्रेस का हाल यहां किसी महाभारत के दुर्योधन जैसा है —शक्ति है, अनुभव है, अनुयायी हैं, लेकिन दिशा नहीं है। यहां कार्यकर्ता अपने ज्ञान और सामर्थ्य का सदुपयोग करने के बजाय भीष्म पितामह जैसे मौन नेताओं और शकुनि जैसे सलाहकारों के बीच फंसे हुए हैं।जो गलत को गलत कहे, वह पार्टी में टिक नहीं पाता, और जो केवल “जी हां” कहे, वही नेतृत्व के करीब रहता है।
भाजपा ने इसका फायदा उठाया है।
वह भावनाओं को नहीं, परिणामों को महत्व देती है।
इसलिए उसके कार्यकर्ता हारने से नहीं डरते, क्योंकि उन्हें पता है —
“अगर संगठन मजबूत है, तो अगला चुनाव भी अपना है।”
कांग्रेस जहां “परंपरा में बंधी विचारधारा” बन चुकी है,
वहीं भाजपा “परिणाम केंद्रित रणनीति” की पार्टी बन गई है।
कांग्रेस में संवाद की कमी है, भाजपा में समायोजन की कला है।
कांग्रेस में असहमति को बगावत माना जाता है, भाजपा में विरोध को अवसर में बदला जाता है।
आज कांग्रेस को जरूरत है आत्म-सुधार की, आत्म-संवाद की और आत्म-सम्मान की।जब तक वह अपने ही नेताओं की आवाज़ सुने बिना आगे बढ़ने की कोशिश करेगी,तब तक उसका वनवास खत्म नहीं होगा।
और भाजपा तब तक आगे बढ़ती रहेगी —
जब तक वह हर नए चेहरे, हर नए विचार और हर संभावित विरोधी को
अपने संगठन में समाहित करने की कला नहीं खो देती।
राजनीति में जीत केवल जनता नहीं देती,
जीत देती है दृष्टि, दिशा और निर्णय की स्पष्टता।
भाजपा के पास यह तीनों हैं और कांग्रेस को अभी इन्हें तलाशना है।


