राजनीति में कभी-कभी घटनाएं सवालों से ज़्यादा संकेत छोड़ जाती हैं। आज रुड़की में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला—जहां कांग्रेस की एक औपचारिक बैठक अचानक सियासी असहजता और अंदरूनी खलबली में बदल गई।
प्रदेश की बिगड़ती कानून व्यवस्था को लेकर 16 फरवरी को राजभवन घेराव की रणनीति बनाने पहुंचे कांग्रेस के कद्दावर नेता प्रीतम सिंह की बैठक तब चर्चा में आ गई, जब वहां अचानक उनके पुराने मित्र और कभी कांग्रेस का हिस्सा रहे यशपाल राणा भी पहुंच गए।
पत्रकारों ने सवाल पूछे।
जवाब में प्रीतम सिंह ने इसे व्यक्तिगत संबंध बताया, लेकिन कैमरों ने यह भी दर्ज किया कि सवालों के बीच वे असहज दिखे। इससे भी ज़्यादा बेचैनी उस खेमे में नजर आई, जिसे स्थानीय राजनीति में सचिन गुप्ता का गुट माना जाता है।
पुराने चुनाव, नई दरारें
रुड़की की राजनीति को जानने वाले यह नहीं भूले हैं कि मेयर चुनाव में यशपाल राणा और सचिन गुप्ता—दोनों आमने-सामने थे। दोनों की पत्नियां चुनावी मैदान में उतरीं और दोनों को हार का सामना करना पड़ा।
आज उसी इतिहास की परछाईं वर्तमान पर आ गिरी।
कुछ स्थानीय चैनलों को दिए गए इंटरव्यू में सचिन गुप्ता ने यशपाल राणा को मिले वोटों पर भी सवाल खड़े कर दिए। यानी मामला सिर्फ शिष्टाचार का नहीं रहा—यह विश्वास, टिकट और भविष्य की राजनीति से जुड़ गया।
बाउंड्री पर खड़े खिलाड़ी की कहानी
यशपाल राणा की स्थिति इन दिनों राजनीति की उस गेंद जैसी है जो बाउंड्री लाइन पर जाकर भी साफ़ नहीं बताती—कैच है या छक्का।
वे कांग्रेस के कार्यक्रमों में बिना बुलाए पहुंचते हैं, कांग्रेस से दूरी रखते हैं, लेकिन मौजूदगी दर्ज कराते हैं। यह दूरी क्या संदेश देती है?
क्या यह कांग्रेस में वापसी की बेचैनी है, या फिर पर्दे के पीछे कोई बड़ी पटकथा लिखी जा चुकी है?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यशपाल राणा को “ऊपर” से आशीर्वाद मिल रहा है यहां तक कि टिकट की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं। अगर ऐसा है, तो सवाल स्वाभाविक है—सचिन गुप्ता खेमे का भविष्य क्या होगा?
नेतृत्व मौन, कार्यकर्ता व्याकुल
प्रीतम सिंह सार्वजनिक तौर पर अनजान बने हुए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के दिलों में बेचैनी साफ़ दिखाई दे रही है।
किसी को डर है कि संगठन के भीतर दरार गहरी न हो जाए,
तो किसी को चिंता है कि मेहनत और निष्ठा के बावजूद राजनीतिक गणित कहीं उन्हें बाहर न कर दे।
यह घटनाक्रम बताता है कि कांग्रेस फिलहाल सिर्फ सत्ता से बाहर नहीं है, बल्कि आंतरिक संतुलन की लड़ाई भी लड़ रही है।
समय, सत्ता और किस्मत—तीनों का खेल एक साथ चल रहा है।
अब देखना यह है कि
क्या यह गेंद मिड-विकेट तक आएगी?
क्या यशपाल राणा की कांग्रेस में एंट्री औपचारिक होगी?
या यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक सियासी ड्रामा बनकर रह जाएगा?


