संपादकीय | उत्तराखंड में भी तेज हुई मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) की तैयारी, पारदर्शिता पर सवाल क्यों?
भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे विशाल जन–इच्छा का प्रतिबिंब है। यहाँ चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि एक पवित्र राष्ट्रीय संस्कार हैं। हर एक मत लोकतांत्रिक व्यवस्था की धड़कन है। ऐसे में मतदाता सूची की शुद्धता केवल भारतीय निर्वाचन आयोग का प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि देश की संवैधानिक आत्मा की सुरक्षा का प्रश्न भी है।
इसी मूल भावना के साथ भारतीय निर्वाचन आयोग ने 1 जुलाई से मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान (SIR) की शुरुआत की। इस अभियान का मकसद साफ है – कोई अपात्र व्यक्ति सूची में शामिल न हो और कोई पात्र नागरिक मताधिकार से वंचित न रह जाए। बिहार के बाद अब उत्तराखंड सहित देश के 12 राज्यों में यह प्रक्रिया तेजी से जारी है।
इससे पहले ऐसा व्यापक पुनरीक्षण वर्ष 2002 से 2004 के बीच हुआ था। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संविधान की दुहाई देने वाले कुछ राजनीतिक दल और उनके शीर्ष नेता संसद के भीतर और बाहर इस संवैधानिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी दिखाई हरी झंडी
SIR के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिकाएं दाखिल की गईं, जिनकी पैरवी कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने की। विपक्ष की दलील थी कि यह प्रक्रिया अनावश्यक है और निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती। हालांकि अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए 26 नवंबर की सुनवाई में स्पष्ट टिप्पणी की कि बिहार में जिन अपात्र मतदाताओं के नाम हटाए गए, उनमें से किसी ने भी आपत्ति दर्ज नहीं कराई।
12 राज्यों में चल रही है व्यापक समीक्षा
अब निर्वाचन आयोग दूसरे चरण में 12 राज्यों के 321 जिलों और 1843 विधानसभा क्षेत्रों के लगभग 51 करोड़ मतदाताओं की मतदाता सूची की समीक्षा कर रहा है।
आंकड़ों के अनुसार:
- 3 दिसंबर तक 99% फॉर्म वितरित किए जा चुके हैं
- 93% से अधिक डेटा का डिजिटलीकरण हो चुका है
- अब तक 4700 से अधिक सर्वदलीय बैठकें आयोजित की जा चुकी हैं
- इन बैठकों में 28,000 से अधिक राजनीतिक प्रतिनिधि शामिल हुए हैं
अंतिम मतदाता सूची 16 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी। जिन मतदाताओं के नाम हटेंगे, उन्हें एक माह तक दावा-आपत्ति का अवसर मिलेगा।
विरोध क्यों? चिंता कैसी?
इतनी पारदर्शी प्रक्रिया के बावजूद विरोध का स्वर तेज होना कई सवाल खड़े करता है। पहले ईवीएम पर संदेह, फिर “वोट चोरी” के आरोप और अब SIR का विरोध — यह “नाच न आए, आंगन टेढ़ा” वाली कहावत को चरितार्थ करता नजर आता है।
लोकसभा चुनाव में सीमित सफलता के बाद कांग्रेस को एक के बाद एक राज्यों में राजनीतिक झटके लगे हैं। बिहार चुनाव तक बने भ्रम के बाद अब आत्ममंथन की बजाय आरोप-प्रत्यारोप का रास्ता अपनाया जा रहा है — ऐसा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है।
उत्तराखंड में भी तैयारियां तेज
उत्तराखंड में भी SIR को लेकर प्रशासनिक तैयारियां जोरों पर हैं। जिला स्तर पर बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) को सक्रिय किया गया है और आम मतदाताओं से अपील की जा रही है कि वे अपने नाम, पते और विवरण की जांच कर समय रहते आवश्यक संशोधन करा लें।
आखिर सवाल यही है —
जब प्रक्रिया पारदर्शी है, न्यायालय की मुहर है और सुधार का उद्देश्य लोकतंत्र को मजबूत करना है, तो फिर डर कैसा? विरोध क्यों?
यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि देश के लोकतंत्र की मजबूती से जुड़ा विषय है।


