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देश

‘आई लव मोहम्मद’ से ‘आई लव महाकाल’ तक – धर्म नहीं, सोच की परीक्षा है यह

Soni Ror
Last updated: October 14, 2025 1:52 am
Soni Ror
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4 Min Read
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कानपुर, उत्तर प्रदेश — एक साधारण-सा पोस्टर, जिस पर लिखा था “I Love Mohammad”, अब पूरे देश में बहस, विवाद और वैचारिक विभाजन का कारण बन गया है। यह मामला केवल एक शहर का नहीं, बल्कि उस सोच का आईना बन गया है जो धीरे-धीरे धर्म के नाम पर समाज को दो हिस्सों में बांटने का प्रयास कर रही है।

कानपुर से शुरू हुई यह कहानी बरेली होते हुए उत्तराखंड, दिल्ली, मध्य प्रदेश तक पहुंच गई। सवाल यह नहीं कि “आई लव मोहम्मद” लिखा क्यों गया, सवाल यह है कि उसके जवाब में “आई लव महाकाल”, “आई लव मोदी”, “आई लव राम” जैसी प्रतिप्रतिक्रियाएं क्यों आईं?
क्या यह सब सिर्फ भावनाओं का टकराव है — या फिर किसी गहरी रणनीति का हिस्सा?

भारत जैसे देश में हर व्यक्ति को अपने धर्म, अपने आराध्य और अपने विश्वास के प्रति प्रेम जताने की पूर्ण स्वतंत्रता है।

आप “जय श्री राम” बोलें, “आई लव मोहम्मद” कहें, “हर हर महादेव” का उद्घोष करें — संविधान इसकी अनुमति देता है।

मगर जब यही प्रेम प्रदर्शन प्रदर्शन-शक्ति में बदल जाता है,
जब मंदिर-मस्जिद की गलियों में भावनाओं की जगह उत्तेजना हावी हो जाती है, तब धर्म नहीं, बल्कि राजनीति सक्रिय हो जाती है।

बरेली की घटना में जब मस्जिदों से भीड़ निकलकर सड़कों पर आई और पत्थरबाज़ी हुई, तो यह स्पष्ट हो गया कि मामला किसी आस्था का नहीं, बल्कि अंध-भक्ति और उकसावे का था।

उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच ने जब “आई लव मोहम्मद” अभियान के पीछे शामिल कुछ नामों की तहकीकात की, तो एक नया पहलू सामने आया।

जांच में पता चला कि कुछ तथाकथित धार्मिक नेताओं ने धर्म को व्यवसाय और राजनीतिक सुरक्षा कवच बना लिया है।

जिन्हें समाज में एकता का संदेश देना चाहिए था, वे धर्म के नाम पर अपनी आर्थिक साम्राज्य की नींव मजबूत कर रहे थे।
मौलाना तौकीर रजा के खिलाफ कार्रवाई में लाखों रुपये की आय और कई संपत्तियों का खुलासा हुआ — जो इस बात का संकेत है कि धर्म की आड़ में कारोबार अब “विश्वास की अर्थव्यवस्था” बन चुका है।

‘आई लव मोदी’ बनाम ‘आई लव मोहम्मद’ — ओवैसी की राजनीति

जब AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि

“इस देश में ‘I Love Modi’ कह सकते हैं, लेकिन ‘I Love Mohammad’ नहीं,” तो उनका तर्क स्वतंत्रता की बात करते हुए भी विभाजन का बीज बो गया।स्व तंत्रता की भावना तब तक सशक्त है जब तक उसमें संतुलन और सम्मान हो।

ओवैसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि जब तस्लीमा नसरीन ने मोहम्मद पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण लिखा था, तब उन्हीं की पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन पर जानलेवा हमला किया था। तो क्या “प्रेम” सिर्फ एक दिशा में होना चाहिए और “विचार” की स्वतंत्रता केवल अपने मत के लिए?

भारत की ताकत उसकी विविधता और सहिष्णुता में है।

हमारा देश इसलिए महान है क्योंकि यहां मंदिर की आरती और मस्जिद की अज़ान, दोनों साथ-साथ गूंजते हैं।

पर आज का सबसे बड़ा खतरा यह है कि कुछ समूह इस विविधता को “वोट की गणना” में बदल रहे हैं।
धर्म को चुनावी पोस्टर बनाया जा रहा है, और आस्था को राजनीतिक हथियार।

“I Love Mohammad” हो या “I Love Mahakal” —
समस्या इन शब्दों में नहीं है, समस्या उस मानसिकता में है जो इन शब्दों को संविधान से बड़ा और इंसान से ऊंचा मान बैठती है।

भारत की आत्मा तब ही सुरक्षित रहेगी जब हम
“आई लव मॉडर्न इंडिया” कहने का साहस रखेंगे
जहां मंदिर-मस्जिद नहीं, विचारों की इज़्ज़त होगी।

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