“समर्पण किया सालों तक, फिर भी टिकट नहीं मिला… क्या यही है राजनीति का फलसफा?”
हरिद्वार/रुड़की:
राजनीति सिर्फ पद की नहीं, सेवा की भावना से शुरू होती है — पर जब सेवा और समर्पण के बावजूद टिकट से वंचित कर दिया जाए, तो यह सवाल उठता है कि क्या राजनीति में समर्पण से ज़्यादा समीकरण मायने रखते हैं?
यह कहानी है रश्मि चौधरी की — एक ऐसा नाम जिसने 19 साल का राजनीतिक जीवन पूरी ईमानदारी से समाज और किसानों को समर्पित किया।
शुरुआत सेवा से, सफर संघर्ष तक

रश्मि चौधरी ने राजनीति में अपने कदम कांग्रेस पार्टी से रखे, किसान मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वह हज़ारों किसानों की आवाज़ बनीं। देश के प्रति समर्पण ऐसा कि NCC जीआरडी कैंप, पैराशूट और बंदूक चलाने का प्रशिक्षण लेकर राष्ट्र सेवा के लिए खुद को तैयार किया।
पारिवारिक धरातल भी सशक्त

रश्मि चौधरी किसी साधारण पृष्ठभूमि से नहीं, बल्कि एक संपन्न और शिक्षित परिवार से आती हैं। ससुर IIT रुड़की में आर्किटेक्चर डिपार्टमेंट के हेड, पति मर्चेंट नेवी के कैप्टन, और तीनों बच्चे अफसर हैं। 38 साल की सफल वैवाहिक जीवन और ‘मिस मोदीनगर’ का खिताब – उनकी जीवन यात्रा खुद में मिसाल है।
राजनीति में बदली विचारधारा, न बदला संघर्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली से प्रभावित होकर कांग्रेस छोड़कर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा। त्रिवेंद्र सिंह रावत पूर्व मुख्यमंत्री जैसे वरिष्ठ नेताओं से सीधे संपर्क और हरिद्वार से लेकर दिल्ली तक पहुंच रखने के बावजूद, विधायक और महापौर जैसे पदों के लिए हर बार दावेदारी ठुकरा दी गई।
समाज में पकड़, पर पार्टी में उपेक्षा

आज रश्मि चौधरी महिलाओं के बीच बेहद लोकप्रिय चेहरा हैं। उनके पास जनसमर्थन, संबंध और अनुभव — तीनों हैं, लेकिन टिकट न मिलना यह दर्शाता है कि शायद राजनीति अब केवल सेवा नहीं, समीकरण का खेल बनती जा रही है।


