उत्तराखंड में राजनीतिक हाशिये पर गुर्जर समाज, संगठनहीनता और अवसरवादिता का परिणाम
सोनी रोड़
उत्तराखंड का हरिद्वार जिला, जो भौगोलिक रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश से सटा है, हमेशा से गुर्जर समाज का सशक्त गढ़ माना जाता रहा है। यह समाज न केवल संख्या में प्रभावशाली है, बल्कि आर्थिक और सामाजिक रूप से भी मजबूत स्थिति रखता है। परंतु विडंबना यह है कि जिस समाज की जड़ें राजनीति में गहरी थीं, वही आज राजनीतिक हाशिये पर खड़ा दिखाई देता है।
कभी सत्ता का केंद्र रहा हरिद्वार
एक समय था जब रुड़की के नेहरू स्टेडियम से लेकर गंगा किनारे की राजनीति तक, गुर्जर समाज की पकड़ महसूस की जा सकती थी।
पूर्व विधायक कुंवर प्रणव सिंह ‘चैंपियन’ चार बार लगातार विधायक रहे — निर्दलीय, कांग्रेस और भाजपा तीनों ही रूपों में।
वहीं, राजेंद्र चौधरी जैसे नेताओं को स्थानीय राजनीति में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के द्वारा “मिनी मुख्यमंत्री” तक कहा जाता था।
हरियाणा के प्रभावशाली गुर्जर नेता करतार सिंह भड़ाना और अब उनके भाई अवतार सिंह भड़ाना ने भी हरिद्वार की राजनीति में अपनी पैठ जमाने का प्रयास किया, परंतु आज तस्वीर बदल चुकी है। जहां यह लोग पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं वहीं पर कुछ लोग इनके पैर उखाड़ने की कोशिश भी कर रहे हैं।
क्यों बिखर गया राजनीतिक आधार
वरिष्ठ पत्रकार संजय खटाना का मानना है कि गुर्जर समाज के हाशिये पर जाने की सबसे बड़ी वजह है —
संगठन से दूरी और अवसरवादी राजनीति। आज समाज के ज्यादातर नेता टिकटार्थी हो गए हैं
आज गुर्जर समाज का बड़ा वर्ग केवल चुनाव के समय सक्रिय होता है,
पर संगठन, विचारधारा और निरंतर सेवा से उसका नाता टूट चुका है।
जिन नेताओं ने संगठन में कार्य किया जैसे रामशरण दास, जो अपनी संगठनात्मक क्षमता के कारण प्रदेश अध्यक्ष बने उन्होंने अपनी जगह बनाई। परंतु अधिकांश नेता केवल टिकटार्थी बनकर रह गए।
पार्टी बदलने की प्रवृत्ति ने किया नुकसान
राजनीति में पार्टी बदलना अब रणनीति नहीं, बल्कि आदत बन चुकी है।
कांग्रेस, भाजपा, बसपा या निर्दलीय गुर्जर समाज के कई नेता हर चुनाव में नई पार्टी की चौखट पर दस्तक देते हैं। इससे पार्टी का भरोसा टूटता है, कार्यकर्ता भ्रमित होता है और समाज की सामूहिक पहचान कमजोर पड़ती है। हरिद्वार जिले में भी ऐसे कई नेता है जो चुनाव के समय चुनाव की तैयारी में करते हैं और उनके उनके समाज के लोगों को भी यह भरोसा नहीं होता कि वह किस पार्टी से चुनाव लड़ेंगे और पूर्व विधायक कुंवर प्रणव सिंह निर्दलीय चुनाव लड़े कांग्रेस से चुनाव लड़े भाजपा से चुनाव लड़े, रविंद्र पनियाला बहुजन समाज पार्टी से लेकर भाजपा तक, राजेंद्र चौधरी भी अपनी दिशा कई बार घूमा चुके हैं परिणामस्वरूप, जिन सीटों पर कभी गुर्जर समाज निर्णायक भूमिका में था, आज वहाँ अन्य जातियों या छोटे-छोटे गुटों के नेता प्रभावशाली बन चुके हैं।
दूसरे समाजों ने भरी खाली जगह
जहाँ गुर्जर समाज संगठन से दूर हुआ, वहीं अन्य समुदायों ने धीरे-धीरे राजनीतिक जमीन मजबूत कर ली। भाजपा जैसी पार्टी ने हमेशा उन वर्गों को प्राथमिकता दी जो संगठन के अंतिम पायदान तक सक्रिय रहे। यहाँ तक कि कई बार छोटे और अपेक्षाकृत नए चेहरे को टिकट देकर पार्टी ने चुनाव जीते, जबकि गुर्जर समाज के वरिष्ठ नेता टिकट के इंतज़ार में रह गए।
भविष्य की राह — संगठन में वापसी
अगर गुर्जर समाज को फिर से राजनीतिक प्रभाव स्थापित करना है, तो उसे संगठन की रीढ़ बनना होगा। नेताओं को केवल चुनावी गतिविधियों तक सीमित न रहकर, स्थायी जनसंपर्क, पार्टी सेवा और सामाजिक एकता पर ध्यान देना होगा। राजस्थान में सचिन पायलट इसका जीवंत उदाहरण हैं, जिन्होंने संगठन के साथ जुड़कर पार्टी में सम्मानजनक स्थान पाया। हरिद्वार जिले में जिला पंचायत अध्यक्ष राजेंद्र सिंह (किरण चौधरी ) को उनके पिता रामपाल सिंह के द्वारा भारतीय जनता पार्टी की निरंतर संगठन में की गई सेवा के परिणाम स्वरुप ही जिला पंचायत अध्यक्ष का पद इनाम में मिला है यह उनकी भारतीय जनता पार्टी के प्रति निष्ठा का परिणाम है।
- गुर्जर समाज में शक्ति, संख्या और नेतृत्व क्षमता की कोई कमी नहीं है, कमी है तो केवल संगठनात्मक अनुशासन और दीर्घकालिक सोच की। यदि यह समाज अपनी जड़ों की ओर लौटे, संगठन के साथ खड़ा हो,तो उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर से गुर्जर समाज निर्णायक भूमिका निभा सकता है। वरना इतिहास की किताबों में “कभी प्रभावशाली रहे” शब्द जुड़ने में देर नहीं लगेगी।


