रुड़की, सोनी रोड़
आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने एक ऐतिहासिक अध्ययन में खुलासा किया है कि भारत के आठ प्रमुख शिव मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर क्षेत्रों में भी स्थित हैं। यह शोध अमृता विश्व विद्यापीठम (भारत) और उप्साला विश्वविद्यालय (स्वीडन) के सहयोग से किया गया और ह्यूमैनिटीज़ एंड सोशल साइंसेज कम्युनिकेशंस (नेचर पोर्टफोलियो) में प्रकाशित हुआ है।
शोध में पाया गया कि उत्तराखंड के केदारनाथ से लेकर तमिलनाडु के रामेश्वरम तक फैले ये मंदिर 79° पूर्वी देशांतर रेखा पर केंद्रित एक संकरी पट्टी—शिव शक्ति अक्ष रेखा (SSAR)—पर स्थित हैं। उपग्रह डेटा और भू-स्थानिक मॉडलिंग से पता चला कि ये क्षेत्र जल, कृषि, पवन और सौर ऊर्जा की उच्च उत्पादकता वाले “हॉटस्पॉट” हैं।
अध्ययन के मुताबिक, एसएसएआर क्षेत्र भारत की कुल भूमि का महज 18.5% हिस्सा कवर करता है, लेकिन इसमें 44 मिलियन टन चावल उत्पादन और 597 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता है—जो देश की वर्तमान स्थापित क्षमता से भी अधिक है।
आईआईटी रुड़की के प्रो. के.एस. काशीविश्वनाथन ने कहा, “यह शोध दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय सभ्यता प्रकृति और स्थायित्व की गहरी समझ रखती थी। मंदिर केवल आस्था के केंद्र नहीं थे, बल्कि संसाधन नियोजन के भी प्रतीक थे।”
शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि ये मंदिर पंचभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—के प्रतीक हैं और प्राचीन काल में इन्हें भूमि, जल और ऊर्जा संसाधनों की गहन जानकारी के आधार पर चुना गया था।
प्रमुख लेखक श्री भाबेश दास के अनुसार, “प्राचीन मंदिर निर्माता आस्था के साथ-साथ पर्यावरण योजनाकार भी थे। उनके निर्णय अनुभवजन्य और व्यावहारिक ज्ञान पर आधारित थे।”
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने कहा, “यह शोध बताता है कि कैसे प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान मिलकर सतत विकास के नए रास्ते खोल सकते हैं।”
यह अध्ययन भारत की सांस्कृतिक धरोहर और आधुनिक जलवायु चुनौतियों के बीच सेतु बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


