अभ्यास और वैराग्य: सफलता के दो पंख
मनुष्य का जीवन अनेक लक्ष्यों से भरा हुआ है, और उनकी प्राप्ति के लिए वह निरंतर प्रयासरत रहता है। सफलता केवल इच्छाओं से नहीं मिलती, बल्कि उसके लिए साधना, समर्पण और निरंतर प्रयास आवश्यक होते हैं। इस यात्रा में अभ्यास और वैराग्य दो ऐसे तत्व हैं जो किसी भी साधक को उसके लक्ष्य तक पहुँचने में सहायता प्रदान करते हैं।
अभ्यास मनुष्य की निरंतरता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। जब कोई व्यक्ति बार-बार प्रयास करता है, तो वह अपने कौशल को निखारता है और असफलताओं से सीखकर आगे बढ़ता है। वहीं, वैराग्य अनासक्ति का भाव है, जो व्यक्ति को भौतिक आकर्षणों और निराशाओं से मुक्त रखता है। जैसे आकाश में उड़ने वाले पक्षी को संतुलित उड़ान के लिए दो पंखों की आवश्यकता होती है, वैसे ही अभ्यास और वैराग्य जीवन में संतुलन बनाए रखते हैं।
जो व्यक्ति अभ्यास द्वारा अपनी क्षमता को निखारता है और वैराग्य द्वारा मन को विचलित होने से बचाता है, वही सच्चे अर्थों में सफलता प्राप्त करता है। अतः, साधक को अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए इन दोनों तत्वों को अपनाना चाहिए, क्योंकि इन्हीं के सहयोग से वह सिद्धि की ओर उन्मुख हो सकता है।


