देश में इस वक्त एविएशन सिस्टम को लेकर जो हाहाकार मचा है, वो सिर्फ एक कंपनी की नाकामी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पोल खोल देने वाला संकट है। जिस इंडिगो को कभी “सस्ती, भरोसेमंद और समय पर उड़ान” का प्रतीक माना जाता था, वही आज यात्रियों के लिए डर, गुस्सा और असहायता का दूसरा नाम बन चुकी है।
यह सच है कि इंडिगो की यह बादशाहत खैरात में नहीं मिली थी। समय की पाबंदी, बेहतर नेटवर्क, नियंत्रित टिकट दरें और आक्रामक विस्तार ने उसे देश की नंबर-वन एयरलाइन बनाया। लेकिन इतिहास गवाह है — जब किसी सेक्टर में मोनोपॉली जन्म लेने लगती है, तो प्रतिस्पर्धा नहीं, मनमानी पैदा होती है। आज वही मनमानी देश के करोड़ों यात्रियों को रुला रही है।
DGCA: लाइसेंस दे दिया, निगरानी भूल गए?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत का नियामक तंत्र आखिर कहां था? DGCA ने लाइसेंस तो दे दिए, दिशानिर्देश और सख्त निगरानी का सिस्टम खड़ा नहीं किया। “सॉरी” बोल देने से सिस्टम ठीक नहीं होता। जब फ्लाइट्स कैंसिल हुईं, जब घंटों-घंटों तक यात्रियों को एयरपोर्ट पर भूखा-प्यासा बैठाया गया, तब सिर्फ खेद प्रकट करना नाकाफी था।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि इंडिगो रिफंड से बचने का प्रयास करती रही। ऐसा महसूस हुआ मानो कंपनी कोर्ट तक जाने के मूड में थी, लेकिन यात्रियों को उनका हक देने को तैयार नहीं थी। यह केवल व्यावसायिक निर्णय नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन का संकेत है।
5000 का टिकट 50,000: क्या आसमान में लूट की खुली छूट?
दूसरी एयरलाइंस भी दूध की धुली नहीं हैं। जिन रूट्स पर 5,000 का टिकट होना चाहिए था, वहां कीमतें 50,000 तक पहुंच गईं। यह ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ नहीं, बल्कि आपदा में अवसर तलाशने जैसी मानसिकता दिखी।
यानी संकट अकेले इंडिगो का नहीं, पूरी इंडस्ट्री का है। लेकिन इंडिगो इसीलिए ज्यादा कटघरे में है क्योंकि वह इस सिस्टम की सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली खिलाड़ी है।
पायलट्स का ‘साइलेंट प्रोटेक्शन’ और अंदरखाने की खामोशी
लंबे समय से एविएशन सेक्टर में एक “साइलेंट प्रोटेक्शन सिस्टम” की बातें होती रही हैं — जहां पायलट्स, मैनेजमेंट और रेगुलेटर के बीच एक अघोषित संतुलन बना रहता है। सवाल यह है कि क्या सुरक्षा, प्रशिक्षण और ऑपरेशनल प्रेशर को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया? अगर हां, तो यह सिर्फ मिसमैनेजमेंट नहीं, बल्कि संभावित रूप से यात्रियों की जान से खिलवाड़ है।
‘टेंपो’ बनती इंडस्ट्री: आसमान में भीड़, ज़मीन पर अव्यवस्था
जिस एविएशन इंडस्ट्री को देश के विकास का प्रतीक माना जाता था, वह आज मोहल्ले के टेंपो जैसे हालात का रूप ले चुकी है —
भीड़, धक्कामुक्की, अनिश्चित समय, बिना जानकारी के रूट बदलना और पैसों की मारामारी।
बुकिंग सिस्टम टैक्सी स्टैंड जैसा बन गया है — “अब नहीं तो बाद में”, “रिफंड नहीं तो एडजस्टमेंट”, “सीट नहीं तो खड़े-खड़े सफर” जैसी मानसिकता पनप चुकी है। यह देश के लिए शर्मनाक स्थिति है।
सरकार का झुकना या मजबूरी?
सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या सरकार बड़ी कंपनियों के आगे झुक गई है?
क्या नागरिक उड्डयन मंत्रालय केवल तमाशबीन बनकर रह गया है?
इतिहास बताता है कि जब सरकारें वक्त रहते सख्त फैसला नहीं लेतीं, तो कंपनियां सिस्टम से बड़ी हो जाती हैं। आज इंडिगो का मामला सिर्फ एक कंपनी का नहीं, बल्कि “कॉरपोरेट बनाम कस्टमर” की लड़ाई बन चुका है।
अगर सरकार ने अब भी ठोस कार्रवाई नहीं की —
– स्पष्ट और सख्त रिफंड पॉलिसी
– आपदा के वक्त टिकट दरों पर सीमा
– फ्लाइट कैंसलेशन पर भारी जुर्माना
– DGCA को जवाबदेह बनाने की व्यवस्था
तो आने वाले समय में भारतीय एविएशन सेक्टर पूरी तरह अराजक हो जाएगा।
वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को झटका
दुनिया आज भारत को एक उभरती हुई ताकत के रूप में देखती है, लेकिन जब देश की सबसे बड़ी एयरलाइन ‘टेंपो सिस्टम’ जैसी प्रतीत होने लगे, तो हमारी वैश्विक साख पर सीधा असर पड़ता है। विदेशी यात्री, निवेशक और टूरिस्ट — सभी के मन में एक ही सवाल उठता है:
क्या भारत का सिस्टम भरोसेमंद है?
अब “सॉरी” नहीं, सख्त सिस्टम चाहिए
आज स्थिति यह है कि “सॉरी” बोलकर काम नहीं चल सकता। इंडिगो हो या दूसरी एयरलाइंस — सबको जवाबदेह बनाना होगा। सरकार को झुकना नहीं, झुकाना नहीं, बल्कि सिस्टम खड़ा करना होगा।
वरना वह दिन दूर नहीं जब आसमान में उड़ने वाला भारत, ज़मीन पर चलते टेंपो जैसा सिस्टम बनकर रह जाएगा — और जनता सिर्फ मजबूरी में टिकट बुक करती रहेगी, अधिकार मांगती रहेगी और हर बार ठगी जाती रहेगी।
यह सिर्फ इंडस्ट्री की नहीं, देश की प्रतिष्ठा की लड़ाई है।


